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Friday, 8 August 2014

श्रीदत्तात्रेय वज्र पन्जर कवचं (Shree Dattatreya Vajra Panjar Kavacham)

श्रीदत्तात्रेय वज्र पन्जर कवचं (Shree Dattatreya Vajra Panjar Kavacham)
इस कवच का वर्णन श्रीरुद्रयामल तन्त्र के हिमवत्खंड में उमामहेश्वर संवाद के रूप में आया है। इस वज्र पन्जर कवच की उपासना सर्वप्रथम स्वयम भगवान शिव ने अपने किरातरूपी महारुद्र अवतार रूप में सम्पन्न की है। इस कवच के माध्यम से ही महर्षि दधीचि ने अपने शरीर को वज्रवत बना लिया था एवं जिनके अस्थियों के द्वारा देवराज इन्द्र को वज्रास्त्र प्राप्त हुआ था। ब्रह्माण्ड के समस्त गुरु मण्डल भगवान महाअवधूत श्री दत्तत्रेय के अधीन हैं व उनके द्वारा ही सन्चालित और संरक्षित हैं। अतः इस स्त्रोत के बारे में कुछ भी कहना साक्षात सूर्य को दीपक दिखाने के बराबर है। परन्तु फिर भी इसके फलश्रुति खण्ड का, जो स्वयम भगवान शिव माता भवानी से कहते हैं; मैं सरलार्थ कर दे रहा हूं -
“ इस कवच का जो भी पाठ या श्रवण करते हैं वे वज्रदेही और दीर्घायु होते हैं। समस्त सुख-दुःखों से परे हो जीवन्मुक्त हो जाते हैं, सर्वत्र सभी संकल्प सिद्ध होते हैं। धर्मार्थकाममोक्ष की प्राप्ति होती है। श्रेष्ठ वाहनादि व सर्वैश्वर्य प्राप्त होता है। वेदादि शास्त्रों का मर्मज्ञ होता है। यह कवच बुद्धि, विद्या, प्रज्ञादि व सर्वसंतोषों का कारक है। सर्वदुःखों का निवारक, शत्रुनिवारक और शीघ्र यशकीर्ति की वृद्धि करनेवाला है। मंत्रतंत्रादि कुयोगों से उतपन्न, ब्रह्मराक्षसादि ग्रहोद्भव, देशकालस्थान से उत्पन्न तापतत्रय और नवग्रह से होने वाले महापातकों एवम सर्वप्रकार के रोगों का नाश इस कवच के १००० पाठ से हो जाता है। ”
श्री दत्त वज्र पन्जर कवचम्
विनियोगः ॐ अस्य श्रीदत्तात्रेय वज्रपन्जर कवच स्तोत्र कवच मंत्रस्य श्री किरातरूपी महारुद्र ऋषिः, अनुष्टुप छंदः, श्री दत्तात्रेयो देवता, द्रां बीजं, आं शक्तिः, क्रौं कीलकं, ॐ आत्मने नमः। ॐ द्रीं मनसे नमः। ॐ आं द्रीं श्रीं सौः ॐ क्लां क्लीं क्लूं क्लैं क्लौं क्लः। श्री दत्तात्रेय प्रसाद सिद्ध्यर्थे समस्त श्रीगुरुमण्डल प्रीति द्वारा मम सम्पूर्ण रक्षणार्थे, स्वकृतेन आत्म मंत्रयंत्रतंत्र रक्षणार्थे च पारायणे विनियोगः।
ऋष्यादिन्यासः 
श्री किरातरूपी महारुद्र ऋषये नमः शिरसि। 
अनुष्टुप छंदसे नमः मुखे। 
श्री दत्तत्रेयो देवतायै नमः ह्रदि। 
द्रां बीजाय नमः गुह्ये। 
आं शक्तये नमः नाभौ।
क्रौं कीलकाय नमः पादयोः। 
श्री दत्तात्रेय प्रसाद सिद्ध्यर्थे समस्त श्रीगुरुमण्डल प्रीति द्वारा मम सम्पूर्ण रक्षणार्थे, स्वकृतेन आत्म मंत्रयंत्रतंत्र रक्षणार्थे च पारायणे विनियोगाय नमः अंजलौ।
करन्यासः                                 ह्र्दयादिन्यासः
ॐ द्रां अंगुष्ठाभ्यां नमः।                      ॐ द्रां ह्रदयाय नमः।
ॐ द्रीं तर्जनीभ्यां नमः।                       ॐ द्रीं शिरसे स्वाहा।
ॐ द्रूं मध्यमाभ्यां नमः।                      ॐ द्रूं शिखायै वषट्।
ॐ द्रैं अनामिकाभ्यां नमः।                    ॐ द्रैं कवचाय हुं।
ॐ द्रौं कनिष्ठिकाभ्यां नमः।                   ॐ द्रौं नेत्रत्रयाय वौषट।
ॐ द्रः करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः।                ॐ द्रः अस्त्राय फट्।
ॐ भूर्भुवः स्वरोम इति दिग्बन्धः।

ध्यानम्ः
जगदंकुरकन्दाय सच्चिदानन्द मूर्तये। दत्तात्रेयाय योगीन्द्रचन्द्राय परमात्मने॥
कदा योगी कदा भोगी कदा नग्नः पिशाचवत्। दत्तात्रेयो हरिः साक्षाद् भुक्तिमुक्ति प्रदायकः॥
वाराणसीपुर स्नायी कोल्हापुर जपादरः। माहुरीपुर भिक्षाशी सह्यशायी दिगम्बरः॥
इन्द्रनील समाकारः चन्द्रकान्तसम द्युतिः। वैडूर्यसदृश स्फूर्तिः चलत्किंचित जटाधरः॥
स्निग्धधावल्य युक्ताक्षो अत्यन्त नीलकनीनिकः। भ्रूवक्षः श्मश्रु नीलांकः शशांक  सदृशाननः॥
हासनिर्जित नीहारः कण्ठनिर्जित कम्बुकः। मांसलांसो दीर्घबाहुः पाणिनिर्जित पल्लवः॥
विशाल पीनवक्षाश्च ताम्रपाणिर्दलोदरः। पृथुल श्रोणि ललितो विशाल जघनस्थलः॥
रम्भास्तम्भोपमानः ऊरूर्जानु पूर्वैकजंघकः। गूढ़गुल्फः कूर्मपृष्ठो लसत् पादोपरिस्थलः॥
रक्तारविन्द सदृश रमणीय पदाधरः। चर्माम्बरधरो योगी स्मर्तृगामी क्षणे क्षणे॥
ज्ञानोपदेश निरतो विपद हरणदीक्षितः। सिद्धासन समासीन ऋजुकायो हसन्मुखः॥
वामहस्तेन वरदो दक्षिणेन् अभयं करः। बालोन्मत्त पिशाचीभिः क्वचिद् युक्तः परीक्षितः॥
त्यागी भोगी महायोगी नित्यानन्दो निरंजनः। सर्वरूपी सर्वदाता सर्वगः सर्वकामदः॥
भस्मोद्धूलित सर्वांगो महापातकनाशनः। भुक्तिप्रदो मुक्तिदाता जीवन्मुक्तो न संशयः॥
एवं ध्यात्वा अनन्यचित्तो मद् वज्रकवचं पठेत्। मामेव पश्यन् सर्वत्र स मया सह संचरेत्॥
दिगम्बरं भस्म सुगन्धलेपनं चक्रं त्रिशूलं डमरुं गदायुधम्।
पद्मासनं योगिमुनीन्द्र वन्दितं दत्तेति नाम स्मरणेन् नित्यम्॥
मूल कवचम्ः
ॐ दत्तात्रेयः शिरः पातु सहस्राब्जेषु संस्थितः । भालं पातु अनसूयेयः चन्द्रमण्डल मध्यगः ॥१॥
कूर्चं मनोमयः पातु हं क्षं व्दिदल पद्मभूः। ज्योतिरूपो अक्षिणी पातु पातु शब्दात्मकः श्रुतिः ॥२॥
नासिकां पातु गन्धात्मा मुखं पातु रसात्मकः। जिह्वां वेदात्मकः पातु दन्तोष्ठौ पातु धार्मिकः ॥३॥
कपोलावत्रिभूः पातु पातु अशेषं ममात्मवित्। स्वरात्मा षोडशाराब्ज स्थितः स्वात्मा अवताद् गलम् ॥४॥
स्कन्धौ चन्द्रानुजः पातु भुजौ पातु कृतादिभूः। जत्रुणी शत्रुजित पातु पातु वक्षः स्थलं हरिः ॥५॥
कादिठान्त व्दादशार पद्मगो मरुदात्मकः। योगीश्वरेश्वरः पातु ह्रदयं ह्रदय स्थितः ॥६॥
पार्श्वे हरिः पार्श्ववर्ती पातु पार्श्वस्थितः समृतः। हठयोगादि योगज्ञः कुक्षी पातु कृपानिधिः ॥७॥
डकारादि फकारान्त दशार सरसीरुहे। नाभिस्थले वर्तमानो नाभिं वह्न्यात्मकोऽवतु ॥८॥
वह्नि तत्वमयो योगी रक्षतान्मणिपूरकम्। कटिं कटिस्थ ब्रह्माण्ड वासुदेवात्मकोऽवतु ॥९॥
बकारादि लकारान्त षट्पत्राम्बुज बोधकः। जल तत्वमयो योगी स्वाधिष्ठानं ममावतु ॥१०॥
सिद्धासन समासीन ऊरू सिद्धेश्वरोऽवतु। वादिसान्त चतुष्पत्र सरोरुह निबोधकः ॥११॥
मूलाधारं महीरूपो रक्षताद् वीर्यनिग्रही। पृष्ठं च सर्वतः पातु जानुन्यस्तकराम्बुजः ॥१२॥
जंघे पातु अवधूतेन्द्रः पात्वंघ्री तीर्थपावनः। सर्वांगं पातु सर्वात्मा रोमाण्यवतु केशवः ॥१३॥
चर्म चर्माम्बरः पातु रक्तं भक्तिप्रियोऽवतु। मांसं मांसकरः पातु मज्जां मज्जात्मकोऽवतु ॥१४॥
अस्थीनि स्थिरधीः पायान्मेधां वेधाः प्रपालयेत्। शुक्रं सुखकरः पातु चित्तं पातु दृढ़ाकृतिः ॥१५॥
मनोबुद्धिं अहंकारं ह्रषीकेशात्मकोऽवतु। कर्मेन्द्रियाणि पात्वीशः पातु ज्ञानेन्द्रियाण्यजः ॥१६॥
बन्धून् बन्धूत्तमः पायात् शत्रुभ्यः पातु शत्रुजित्। गृहाराम धनक्षेत्र पुत्रादीन् शंकरोऽवतु ॥१७॥
भार्यां प्रकृतिवित् पातु पश्वादीन् पातु शांर्गभृत्। प्राणान्पातु प्रधानज्ञो भक्ष्यादीन् पातु भास्करः ॥१८॥
सुखं चन्द्रात्मकः पातु दुःखात् पातु पुरान्तकः। पशून् पशुपतिः पातु भूतिं भूतेश्वरो मम् ॥१९॥
प्राच्यां विषहरः पातु पातु आग्नेयां मखात्मकः। याम्यां धर्मात्मकः पातु नैर्ऋत्यां सर्ववैरिह्रत् ॥२०॥
वराहः पातु वारुण्यां वायव्यां प्राणदोऽवतु। कौबेर्यां धनदः पातु पातु ऐशान्यां महागुरुः ॥२१॥
ऊर्ध्वं पातु महासिद्धः पातु अधस्ताद् जटाधरः। रक्षाहीनं तु यत्स्थानं रक्षतु आदिमुनीश्वरः ॥२२॥
फलश्रुतिः
एतन्मे वज्रकवचं यः पठेच्छृणुयादपि । वज्रकायः चिरंजीवी दत्तात्रेयो अहमब्रुवम् ॥२३॥
त्यागी भोगी महायोगी सुखदुःख विवर्जितः । सर्वत्र सिद्धिसंकल्पो जीवन्मुक्तोऽथ वर्तते ॥२४॥
इत्युक्त्वान्तर्दधे योगी दत्तात्रेयो दिगम्बरः । दलादनोऽपि तज्जपत्वा जीवन्मुक्तः स वर्तते ॥२५॥
भिल्लो दूरश्रवा नाम तदानीं श्रुतवानिदम् । सकृच्छ्र्वणमात्रेण वज्रांगो अभवदप्यसौ ॥२६॥
इत्येतद वज्रकवचं दत्तात्रेयस्य योगिनः । श्रुत्वाशेषं शम्भुमुखात् पुनरप्याह पार्वती ॥२७॥
एतत् कवचं माहात्म्यं वद विस्तरतो मम् । कुत्र केन कदा जाप्यं किं यज्जाप्यं कथं कथम् ॥२८॥
उवाच शम्भुस्तत्सर्वं पार्वत्या विनयोदितम् । श्रृणु पार्वति वक्ष्यामि समाहितमनाविलम् ॥२९॥
धर्मार्थकाममोक्षाणां इदमेव परायणम् । हस्त्यश्वरथपादाति सर्वैश्वर्य प्रदायकम् ॥३०॥
पुत्रमित्रकलत्रादि सर्वसन्तोष साधनम् । वेदशास्त्रादि विद्यानां निधानं परमं हि तत् ॥३१॥
संगीतशास्त्रसाहित्य सत्कवित्व विधायकम् । बुद्धि विद्या स्मृतिप्रज्ञां अतिप्रौढिप्रदायकम् ॥३२॥
सर्वसन्तोष करणं सर्व दुःख निवारणम् । शत्रु संहारकं शीघ्रं यशः कीर्तिविवर्धनम् ॥३३॥
अष्टसंख्या महारोगाः सन्निपातः त्रयोदशः । षण्णवत्यक्षिरोगाश्च विंशतिर्मेहरोगकाः ॥३४॥
अष्टादश तु कुष्ठानि गुल्मानि अष्टविधान्यपि । अशीतिर्वातरोगाश्च चत्वारिंश्त्तु पैत्तिकाः ॥३५॥
विंशति श्लेष्मरोगाश्च क्षयचातुर्थिकादयः । मन्त्रयन्त्रकुयोगाद्याः कल्पतन्त्रादि निर्मिताः ॥३६॥
ब्रह्मराक्षस वेतालकूष्माण्डादि ग्रहोद्भवाः । संगजा देशकालस्थान तापत्रयसमुत्थिताः ॥३७॥
नवग्रह समुद्भूता महापातक सम्भवाः । सर्वे रोगाः प्रणश्यन्ति सहस्रावर्तनाद् ध्रुवम् ॥३८॥
अयुतावृत्ति मात्रेण वन्ध्या पुत्रवति भवेत् । अयुत व्दितयावृत्या हि अपमृत्युर्जयो भवेत् ॥३९॥
अयुत त्रितयाच्चैव खेचरत्वं प्रजायते । सहस्रादयुतादर्वाक् सर्वकार्याणि साधयेत् ॥४०॥
लक्षावृत्त्या कार्यसिद्धिः भवत्येव न संशयः । विषवृक्षस्य मूलेषु तिष्ठन् वै दक्षिणामुखः ॥४१॥
कुरुते मासमात्रेण वैरिणं विकलेन्द्रियम् । औदुम्बर तरोर्मूले वृद्धिकामेन् जाप्यते ॥४२॥
श्रीवृक्षमूले श्रीकामी तिंतिणी शांतिकर्मणि । ओजस्कामो अश्वत्थमूले स्त्रीकामैः सहकारके ॥४३॥
ज्ञानार्थी तुलसीमूले गर्भगेहे सुतार्थिभिः । धनार्थिभिस्तु सुक्षेत्रे पशुकामैस्तु गोष्ठके ॥४४॥
देवालये सर्वकामैस्तत्काले सर्वदर्शितम । नाभिमात्रजले स्थित्वा भानुम् आलोक्य यो जपेत् ॥४५॥
युद्धे वा शास्त्रवादे वा सहस्त्रेण जयो भवेत् । कंठमात्रे जले स्थित्वा यो रात्रौ कवचं पठेत् ॥४६॥
ज्वरापस्मार कुष्ठादि तापज्वर निवारणम् । यत्र यत्स्यात्स्थिरं यद्यत्प्रसन्नं तन्निवर्तते॥४७॥
तेन् तत्र हि जप्तव्यं ततः सिद्धिर्भवेद्‍ ध्रुवं । इत्युक्त्वान् च शिवो गौर्ये रहस्यं परमं शुभम् ॥४८॥
यः पठेत् वज्रकवचं दत्तात्रेयो समो भवेत् । एवं शिवेन् कथितं हिमवत्सुतायै प्रोक्तम् ॥४९॥
दलादमुनये अत्रिसुतेन पूर्वम् यः कोअपि वज्रकवचं। पठतीह लोके दत्तोपमश्चरति योगिवरश्चिरायुः॥५०॥

॥ हरिः ॐ तत्सत् श्री सदगुरुः महावधूत दत्त ब्रह्मार्पणमस्तु ॥
पाठ विधिः
१००० पाठ का संकल्प लें। गुरु पूजन व गणेश पूजन कर पाठ आरम्भ करें। पहले पाठ में मूल कवच और फलश्रुति दोनों का पाठ करें। बीच के पाठों में मात्र मूल कवच का पाठ करें। और अंतिम पाठ में पुनः मूल कवच और फलश्रुति दोनों का पाठ करें। आप १००० पाठ को ५ या ११ या २१ दिनों में सम्पन्न कर सकते हैं। इस तरह इस सम्पूर्ण प्रक्रम को आप ५ बार करें। तो कुल ५००० पाठ सम्पन्न हो जायेंगे। प्रत्येक १००० पाठ की समाप्ति पर दशांश हवन करें और एक कुंवारी कन्या को भोजन वस्त्रादि प्रदान करें।
प्रयोग विधिः
नित्य किसी भी पूजन या साधना को करने से पूर्व और अन्त में आप कवच का ५ बार पाठ करें। रोगयुक्त अवस्था में या यात्राकाल में स्तोत्र को मानसिक रूप से भावना पूर्वक स्मरण कर लें।
इसी तरह यदि आप श्मशान में किसी साधना को कर रहें हों तो एक लोहे की छ्ड़ को कवच से २१ बार अभिमंत्रित कर अपने चारों ओर घेरा बना लें। और साधना से पूर्व व अन्त में कवच का ५-५ बार पाठ कर लें। जब कवच सिद्धि की साधना कर रहे हो उस समय एक लोहे की छ्ड़ को भी गुरु चित्र या यंत्र के सामने रख सकते हैं। और बाद में उपरोक्त विधि से प्रयोग कर सकते हैं।
विशेषः यदि आप पाठ में आये शरीर के अंगों में न्यास की भावना करें तो प्रभाव कई गुणित हो जायेगा।
सदगुरुदेव भगवान श्री निखिलेश्वरानंद आपके समस्त अभीष्टों को पूर्ण करें ऐसी ही उनके श्री चरणों में प्रार्थना करता हूं।
॥ श्री गुरुचरणार्पणमस्तु ॥
॥ क्षमस्व परमेश्वरः ॥








Sunday, 25 August 2013

तांत्रोक्त श्री गुरु कवचम् (Tantrokta Shree Guru Kavacham)

तांत्रोक्त श्री गुरु कवचम् 
(Tantrokta Shree Guru Kavacham)
इस तांत्रोक्त गुरु कवच की उपासना सर्वप्रथम स्वयम परम ब्रह्म ने की थी। इस कवच मे गुरु स्वरूप में स्वयम श्री आदि शिव ही स्थापित हैं। इसे स्वयम श्रीशिव ने माँ भवानी के कहने पर उन्हे बताया था। यह कवच अति दुर्लभ श्री विश्वसार तन्त्र के ऊर्ध्वाम्नाय खण्ड में उद्धृत है। और मेरी अत्यंत अनुभूत है। इसके फलश्रुति खण्ड में भगवान शिव जगदम्बा भवानी से कहते हैं कि – 
“ हे देवि यह गुरु कवच ब्रह्म लोक में भी अति दुर्लभ है और मात्र आपसे अत्यधिक स्नेह के कारण इसे मैंने कहा है किसी और से नहीं। जो इसका पूजा काल और विशेषतः जप काल में पाठ करते हैं उन्हें भुक्ति और मुक्ति की प्राप्ति होती है, सर्व मंत्रों के जप का फल, सर्व यंत्रों के अर्चन का फल और सर्व तीर्थों के भ्रमण व सेवन का फल प्राप्त होता है। भोजपत्र में अष्टगन्ध( आप केशर या गोरोचन या लालचन्दन या तीनों के मिश्रण का भी उपयोग कर सकते हैं) के द्वारा चक्र(तांत्रोक्त गुरु यंत्र) को लिख कर तथा कवच को भी लिख कर प्राण प्रतिष्ठा कर पूजन कर मिश्री युक्त गौ दुग्ध से गुरु मण्डल का गुरु मन्त्र द्वारा शुद्ध होकर जो साधक तर्पण करता है और फिर उसे किसी गुटिका (चाँदी या त्रिलौह के तावीज) में रख कर धारण करता है, वह सर्व प्रकार के भूतादिकों के भयों से मुक्त हो जाता है। जो त्रिकाल कवच पाठ करता है वह भव बन्धनों से मुक्त हो जाता है।”

तांत्रोक्त श्री गुरु कवचम्
विनियोगः ॐ नमोऽस्य श्रीगुरुकवच नाम मंत्रस्य श्री परम ब्रह्म ऋषिः, सर्व वेदानुज्ञो देव देवो श्रीआदि शिवः देवता, नमो हसौं हंसः हसक्षमलवरयूं सोऽहं हंसः बीजं, सहक्षमलवरयीं शक्तिः, हंसः सोऽहं कीलकं, समस्त श्रीगुरुमण्डल प्रीति द्वारा मम सम्पूर्ण रक्षणार्थे, स्वकृतेन आत्म मंत्रयंत्रतंत्र रक्षणार्थे च पारायणे विनियोगः।
ऋष्यादिन्यासः 
श्री परम ब्रह्म ऋषये नमः शिरसि। 
अनुष्टुप छंदसे नमः मुखे। 
सर्व वेदानुज्ञ देव देवो श्रीआदि शिवः देवतायै नमः ह्रदि। 
नमः हसौं हंसः हसक्षमलवरयूं सोऽहं हंसः बीजाय नमः गुह्ये। 
सहक्षमलवरयीं शक्तये नमः नाभौ।
हंसः सोऽहं कीलकाय नमः पादयोः। 
समस्त श्रीगुरुमण्डल प्रीति द्वारा मम सम्पूर्ण रक्षणार्थे, स्वकृतेन आत्म मंत्रयंत्रतंत्र रक्षणार्थे च पारायणे विनियोगाय नमः अंजलौ।
करन्यासः 
हसां अंगुष्ठाभ्यां नमः।
हसीं तर्जनीभ्यां नमः।
हसूं मध्यमाभ्यां नमः।
हसैं अनामिकाभ्यां नमः।
हसौं कनिष्ठिकाभ्यां नमः।
हसः करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः।
ह्रदयादिन्यासः
हसां ह्रदयाय नमः।
हसीं शिरसे स्वाहा।
हसूं शिखायै वषट्।
हसैं कवचाय हुं।
हसौं नेत्रत्रयाय वौषट्।
हसः अस्त्राय फट्।
ध्यानम्ः
श्री सिद्ध मानव मुखा गुरवः स्वरूपं संसार दाह शमनं व्दिभुजं त्रिनेत्रं ।
वामांगं शक्ति सकलाभरणैर्विभूषं ध्यायेज्जपेत् सकल सिद्धि फल प्रदं च ॥
मूल कवचम्ः
ॐ नमः प्रकाशानन्दनाथः तु शिखायां पातु मे सदा ।
परशिवानन्द नाथः शिरो मे रक्षयेत् सदा ॥१॥
परशक्तिदिव्यानन्द नाथो भाले च रक्षतु ।
कामेश्वरानन्द नाथो मुखं रक्षतु सर्व धृक् ॥२॥
दिव्यौघो मस्तकं देवि पातु सर्व शिरः सदा ।
कण्ठादि नाभि पर्यन्तं सिद्धौघा गुरवः प्रिये ॥३॥
भोगानन्द नाथ गुरुः पातु दक्षिण बाहुकम् ।
समयानन्द नाथश्च सन्ततं ह्रदयेऽवतु ॥४॥
सहजानन्द नाथश्च कटिं नाभिं च रक्षतु ।
एष स्थानेषु सिद्धौघाः रक्षन्तु गुरवः सदा ॥५॥
अधरे मानवौघाश्च गुरवः कुल नायिके ।
गगनानन्द नाथश्च गुल्फयोः पातु सर्वदा ॥६॥
नीलौघानन्द नाथश्च रक्षयेत् पाद् पृष्ठतः ।
स्वात्मानन्द नाथ गुरुः पादांगुलीश्च रक्षतु ॥७॥
कन्दोलानन्द नाथश्च रक्षेत् पाद् तले सदा ।
इत्येवं मानवौघाश्च न्येसन्नाभ्यादि पादयोः ॥८॥
गुरुर्मे रक्षयेदुर्व्या सलिले परमो गुरुः ।
परापर गुरुर्वह्नौ रक्षयेत् शिव वल्लभे ॥९॥
परमेष्ठी गुरुश्चैव रक्षयेत् वायु मण्डले ।
शिवादि गुरवः साक्षात् आकाशे रक्षयेत् सदा ॥१०॥
इन्द्रो गुरुः पातु पूर्वे आग्नेयां गुरुरग्नयः ।
दक्षे यमो गुरुः पातु नैॠत्यां निॠतिगुरुः ॥११॥
वरुणो गुरुः पश्चिमे वायव्यां मारुतो गुरुः ।
उत्तरे धनदः पातु ऐशान्यां ईश्वरो गुरुः ॥१२॥
ऊर्ध्वं पातु गुरुर्ब्रह्मा अनन्तो गुरुरप्यधः ।
एवं दश दिशः पान्तु इन्द्रादि गुरवः क्रमात् ॥१३॥
शिरसः पाद पर्यन्तं पान्तु दिव्यौघ सिद्धयः ।
मानवौघाश्च गुरवो व्यापकं पान्तु सर्वदा ॥१४॥
सर्वत्र गुरु रूपेण संरक्षेत् साधकोत्तमः ।
आत्मानं गुरु रूपं च ध्यायेन मंत्रं सदा बुधः ॥१५॥
फलश्रुतिः
इत्येवं गुरु कवचं ब्रह्म लोकेऽपि दुर्लभम् ।
तव प्रीत्या मयाऽख्यातं न कस्य कथितं प्रिये ॥
पूजा काले पठेद् यस्तु जप काले विशेषतः ।
त्रैलोक्य दुर्लभम् देवि भुक्ति मुक्ति फलप्रदम् ॥
सर्व मन्त्र फलं तस्य सर्व यन्त्र फलं तथा ।
सर्व तीर्थ फलं देवि यः पठेत् कवचं गुरोः ॥
अष्टगन्धेन् भूर्जे च लिख्यते चक्र संयुतम् ।
कवचं गुरु पंक्तेस्तु भक्त्या च शुभ वासरे ॥
पूजयेत् धूप दीपाद्यैः सुधाभिः सित संयुतैः ।
तर्पयेत् गुरु मन्त्रेण साधकः शुद्ध चेतसा ॥
धारयेत् कवचं देवि इह भूत भयापहम् ।
पठेन्मन्त्री त्रिकालं हि स मुक्तो भव बन्धनात् ॥
एवं कवचं परमं दिव्य सिद्धौघ कलावान ।
॥ हरिः ॐ तत्सत् श्री सदगुरुः ब्रह्मार्पणमस्तु ॥
पाठ विधिः
१००० पाठ का संकल्प लें। गुरु पूजन व गणेश पूजन कर पाठ आरम्भ करें। पहले पाठ में मूल कवच और फलश्रुति दोनों का पाठ करें। बीच के पाठों में मात्र मूल कवच का पाठ करें। और अंतिम पाठ में पुनः मूल कवच और फलश्रुति दोनों का पाठ करें। आप १००० पाठ को ५ या ११ या २१ दिनों में सम्पन्न कर सकते हैं। इस तरह इस सम्पूर्ण प्रक्रम को आप ५ बार करें। तो कुल ५००० पाठ सम्पन्न हो जायेंगे।
प्रयोग विधिः
नित्य किसी भी पूजन या साधना को करने से पूर्व और अन्त में आप कवच का ५ बार पाठ करें। रोगयुक्त अवस्था में या यात्राकाल में स्तोत्र को मानसिक रूप से भावना पूर्वक स्मरण कर लें।
इसी तरह यदि आप श्मशान में किसी साधना को कर रहें हों तो एक लोहे की छ्ड़ को कवच से २१ बार अभिमंत्रित कर अपने चारों ओर घेरा बना लें। और साधना से पूर्व व अन्त में कवच का ५-५ बार पाठ कर लें। जब कवच सिद्धि की साधना कर रहे हो उस समय एक लोहे की छ्ड़ को भी गुरु चित्र या यंत्र के सामने रख सकते हैं। और बाद में उपरोक्त विधि से प्रयोग कर सकते हैं।

सदगुरुदेव भगवान श्री निखिलेश्वरानंद से सबके लिए कल्याण कामना करता हूं।
॥ श्री गुरुचरणार्पणमस्तु ॥
॥ क्षमस्व परमेश्वरः ॥

Saturday, 24 August 2013

Shree Nikhileshwaranada Kavacham श्री निखिलेश्वरानंद कवचं

आत्म रक्षा व साधनात्मक शक्ति रक्षा

जैसे ही कोई व्यक्ति पुलिस मे भर्ती होता है, इसकी खबर चोरों, लुटेरों आदि असामाजिक तत्वों को शीघ्र हो जाती है। और वो सभी उस पर कड़ी नजर रखने लगते हैं कि जैसे ये पुलिस हमारे विरुद्ध कोई कार्यवाई करता है तो किस तरह उसे रास्ते से हटाया जा सके, मारा जा सके।
यही बात आध्यात्मिक जगत में भी लागू होती है। जब कोई जातक दीक्षित होता है या साधनात्मक मार्ग पर चलता है तो सभी की सभी नकारात्मक शक्तियाँ, अहंकारी दुष्ट प्रवृत्ति के साधक, सिद्ध, तान्त्रिक आदि भी ऐसे साधकों से ईर्ष्या एवम वैर भाव रखने लगते हैं। और मौका पाने पर ऐसे साधकों को परेशान करते हैं, उसके आस पास के वातावरण को प्रतिकूल करने के लिये उल्टे-सीधे प्रयोग करते हैं और तो और उनकी साधनात्मक ऊर्जा को चुराने की भी कोशिश करते हैं। ऐसा काम ज्यादातर  साधक के साथ क्रियाशील शक्तियाँ ही करती हैं। अधकचरे तान्त्रिकों के चक्कर में तो वो तब आता है जब वो निःस्वार्थ भाव से लोगों की मदद करता है या फिर विशुद्ध साधनात्मक वातावरण में प्रवेश करता है जैसे कि सन्यास जीवन में। और भी बहुत सारी स्थितियाँ हैं।
वैसे तो साधक के लिए गुरुमंत्र ही सर्वोपरि है। परन्तु साधनात्मक जीवन में बहुत सारे पहलुओं से आयामों से परिचित होना पड़ता है, उनका ज्ञान रखना पड़ता है। यहाँ तक कि साधक के आस पास स्वयं उसके परिवार आदि में भी ऐसे लोग होते हैं जो उसकी आध्यात्मिक ऊर्जा का अवशोषण कर लेते हैं। कभी-कभी उनके पूर्वज आदि भी ऐसा करते हैं। परन्तु इन सब बातों का पता एक सामान्य साधक को नहीं चलता। पूर्व जन्मों के कर्म दोष भी हो सकते हैं। गुरु भी हर एक तथ्य को आपको प्रत्यक्ष रूप से नहीं बता सकते क्योंकि शिविरों आदि में उन्हे अत्यधिक ऊर्जा लगानी पड़ती है, मेहनत करनी पड़ती है, स्वयं की भी साधना करनी पड़ती है। आखिर उनके भी तो गुरु हैं। इसलिए आपको अपने गुरु द्वारा रचित साहित्यों और अन्य आध्यात्मिक व साधनत्मक ग्रंथों का भी अध्ययन करना चाहिए। या फिर अपने वरिष्ठ गुरु भाईयों या साधकों की सहायता लेनी चाहिए।
खैर ये विषय तो इतना गहन और लम्बा है कि एक ग्रन्थ ही तैयार हो जाए। अब आते हैं मूल बिंदु पर। मैं यहाँ पर आध्यात्मिक रूप से कु्छ परम कवचों को दे रहा हूं। जिनका यदि आप उपयोग करते हैं तो न केवल आप पूर्ण रूपेण विपक्ष द्वारा किए जा रहे तंत्र मंत्रादिकों से सुरक्षित रहेंगे अपितु आप जो भी साधनात्मक शक्तियाँ अर्जित करते हैं वो भी पूर्ण रूपेण कवचित रहेगी। कोई भी उनका हरण नहीं कर पायेगा।
और एक महत्वपूर्ण बात वो यह है कि आप ये न सोचें कि मात्र निर्देशित संख्या में कवच या मंत्र पाठ कर लिया और हो गया आपको वो कवच सिद्ध। ऐसा नहीं होता। क्योंकि ये कलियुग है और आजकल का रहन-सहन, खान-पान, चिन्तन-मनन, कार्य-व्यापार आदि ऐसा हो गया है कि मनुष्य के न चाहते हुये भी कुछ ऐसे दुष्कर्म हो जाते हैं जिनका उन्हे खुद ही पता नहीं होता। अतः साधनात्मक ऊर्जा धीरे-धीरे क्षीण होती जाती है। क्योंकि आप समाज में रह कर साधना कर रहे हैं। कोई सन्यासी तो हैं नहीं कि २४ घंटे साधनात्मक चिन्तन ही हो। और न ही उन जैसा सधा हुआ सिद्ध शरीर जो किसी भी साधनात्मक शक्ति की ऊर्जा को एक ही बार में भलीभांति अपने आप में समाहित कर सके, पचा सके। अतः आप किसी भी साधना को करते हैं तो ये आवश्यक है कि आप मूल साधना को कम-से-कम ४-५ बार करें। और उसके बाद उसकी निरंतरता बनाये रखने के लिये नित्य कवच या मंत्र का कुछ मात्रा में पाठ या जप करें। विशेषतया कवच या स्तोत्र आदि की सिद्धि १००० पाठ से हो जाती है। और इस तरह ४-५ बार में कुल चार या पाँच हजार पाठ सम्पन्न हो जाते हैं। कुछ कवचों और स्तोत्रों में उनकी पाठ संख्या दी गयी होती है। इन सबके के बाद ही आप कवच या स्तोत्र में लिखे प्रयोग आदि को करने की पात्रता अर्जित करते हैं। नीचे मैं कुछ उच्च कोटि के कवचों को दे रहा हूं । इन कवचों के मध्यम से आप दुष्कर साधनाओं को भी सम्पन्न कर सकते हैं। श्मशान आदि की साधना में इनके द्वारा चक्र निर्माण और उसके बाद स्वयं के शरीर का कीलन जिससे कोई भी दुष्ट या नकारात्मक शक्तियाँ आपका अहित न कर पायें, आप कर सकते हैं।
यहाँ और आने वाले पोस्ट में निम्न कवच होंगे। आप किसी की भी साधना कर सकते हैं।
१. श्री निखिलेश्वरानंद कवच
२. तांत्रोक्त श्री गुरु कवच
३. श्री दत्तात्रेय वज्र पंजर कवच
१. श्री निखिलेश्वरानंद कवच
विनियोगः  ॐ अस्य श्री निखिलेश्वरानंद कवचस्य श्री मुद्गल ऋषिः, अनुष्टुप छंदः, श्री गुरुदेवो निखिलेश्वरानंद परमात्मा देवता, महोस्तवं रूपं च इति बीजम, प्रबुद्धम निर्नित्यम इति कीलकम, अथौ नेत्रं पूर्णं इति कवचम, श्री भगवत्पाद निखिलेश्वरानंद प्रीति द्वारा मम सम्पूर्ण रक्षणार्थे, स्वकृतेन आत्म मंत्रयंत्रतंत्र रक्षणार्थे च पारायणे विनियोगः।
ऋष्यादिन्यासः 
श्री मुद्गल ऋषये नमः शिरसि।  
अनुष्टुप छंदसे नमः मुखे।  
श्री गुरुदेवो निखिलेश्वरानंद परमात्मा देवतायै नमः ह्रदि।  
महोस्तवं रूपं च इति बीजाय नमः गुह्ये।  
प्रबुद्धम निर्नित्यम इति कीलकाय नमः पादयोः।  
अथौ नेत्रं पूर्णं इति कवचाय नमः सर्वांगे,
श्री भगवत्पाद निखिलेश्वरानंद प्रीति द्वारा मम सम्पूर्ण रक्षणार्थे, स्वकृतेन आत्म मंत्रयंत्रतंत्र रक्षणार्थे च पारायणे विनियोगाय नमः अंजलौ।
करन्यासः 
श्री सर्वात्मने निखिलेश्वराय अंगुष्ठाभ्यां नमः।
श्री मंत्रात्मने पूर्णेश्वराय तर्जनीभ्यां नमः।
श्री तंत्रात्मने वागीश्वराय मध्यमाभ्यां नमः।
श्री यंत्रात्मने योगीश्वराय अनामिकाभ्यां नमः।
श्री शिष्य प्राणात्मने कनिष्ठिकाभ्यां नमः।
श्री सच्चिदानंद प्रियाय करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः।
ह्रदयादिन्यासः
श्रीं शेश्वरः ह्रदयाय नमः।
ह्रीं शेश्वरः शिरसे स्वाहा।
क्लीं शेश्वरः शिखायै वषट्।
तपसेश्वरः कवचाय हुं।
तापेशेश्वरः नेत्रत्रयाय वौषट्।
एकेश्वरः अस्त्राय फट्।
मूल कवचम्ः
शिरः सिद्धेश्वरः पातु ललाटं च परात्परः। 
नेत्रे निखिलेश्वरानंदः नासिका नरकान्तकः ॥१॥
कर्णौ कालात्मकः पातु मुखं मंत्रेश्वरस्तथा। 
कण्ठं रक्षतु वागीशः भुजौ च भुवनेश्वरः ॥२॥
स्कन्धौ कामेश्वरः पातु ह्र्दयं ब्रह्मवर्चसः। 
नाभिं नारायणो रक्षेत ऊरुं ऊर्जस्वलोऽपि वै ॥३॥
जानुनि सच्चिदानंदः पातु पादौ शिवात्मकः। 
गुह्यं लयात्मकः पायात् चित्तं चिन्तापहारकः ॥४॥
मदनेशः मनः पातु पृष्ठं पूर्णप्रदायकः। 
पूर्वं रक्षतु तंत्रेशः यंत्रेशः वारुणीं तथा ॥५॥
उत्तरं श्रीधरः रक्षेत दक्षिणं दक्षिणेश्वरः। 
पातालं पातु सर्वज्ञः ऊर्ध्वं में प्राणसंज्ञकः ॥६॥
कवचेनावृतो यस्तु यत्र कुत्रापि गच्छति। 
तत्र सर्वत्र लाभः स्यात् किंचिदत्र न संशयः ॥७॥
फलश्रुतिः
यं यं चिन्तयते काम तं तं प्राप्नोति निश्चितं। 
धनवान बलवान लोके जायते समुपासकः ॥८॥
ग्रह भूत पिशाचाश्च यक्ष गर्न्धव राक्षसाः। 
नश्यन्ति सर्व विघ्नानि दर्शनात् कवचेनावृतम् ॥९॥
य इदं कवचं पुण्यं प्रातः पठति नित्यशः। 
सिद्धाश्रमः पदारूढ़ः ब्रह्मभावेन भूयते ॥१०॥
॥ हरिः ॐ तत्सत् श्री निखिल ब्रह्मार्पणमस्तु ॥
पाठ विधिः
१००० पाठ का संकल्प लें। गुरु पूजन व गणेश पूजन कर पाठ आरम्भ करें। पहले पाठ में मूल कवच और फलश्रुति दोनों का पाठ करें। बीच के पाठों में मात्र मूल कवच का पाठ करें। और अंतिम पाठ में पुनः मूल कवच और फलश्रुति दोनों का पाठ करें। आप १००० पाठ को ५ या ११ या २१ दिनों में सम्पन्न कर सकते हैं। इस तरह इस सम्पूर्ण प्रक्रम को आप ५ बार करें। तो कुल ५००० पाठ सम्पन्न हो जायेंगे।
प्रयोग विधिः
नित्य किसी भी पूजन या साधना को करने से पूर्व और अन्त में आप कवच का ५ बार पाठ करें। रोगयुक्त अवस्था में या यात्राकाल में स्तोत्र को मानसिक रूप से भावना पूर्वक स्मरण कर लें।
इसी तरह यदि आप श्मशान में किसी साधना को कर रहें हों तो एक लोहे की छ्ड़ को कवच से २१ बार अभिमंत्रित कर अपने चारों ओर घेरा बना लें। और साधना से पूर्व व अन्त में कवच का ५-५ बार पाठ कर लें। जब कवच सिद्धि की साधना कर रहे हो उस समय एक लोहे की छ्ड़ को भी गुरु चित्र या यंत्र के सामने रख सकते हैं। और बाद में उपरोक्त विधि से प्रयोग कर सकते हैं।

सदगुरुदेव भगवान श्री निखिलेश्वरानंद से सबके लिए कल्याण कामना करता हूं।
॥ श्री गुरुचरणार्पणमस्तु ॥
॥ क्षमस्व परमेश्वरः ॥